सिहाह सित्ता: हदीस की 6 मुस्तनद किताबें और उनके अज़ीम इमाम
मुक़द्दिमा
इस्लाम में क़ुरआन के बाद सबसे अहम दर्जा हदीस का है। हदीस
यानी नबी करीम ﷺ के अक़वाल, अफआल और तक़रीर। _मैं जब मदरसे में था तो उस्ताद हमेशा कहते थे:
"बेटा क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, और हदीस उसकी तफसीर है। दोनों के बग़ैर दीन मुकम्मल
नहीं।"_ सहाबा इकराम ने इनको महफूज़ किया, फिर ताबईन और तबा तबाईन ने। लेकिन दूसरी
और तीसरी सदी हिजरी में कुछ मुहद्दिसीन ने हदीस को जमा करने का अज़ीम काम किया। उन्हीं
में से 6 किताबें ऐसी हैं जिन्हें पूरी उम्मत ने "सिहाह सित्ता" का लक़ब
दिया। सिहाह सित्ता का मतलब है "6 सही किताबें"।
_सच
कहूं तो जब पहली बार सिहाह सित्ता का नाम सुना था तो लगा 6 कोई आम सी किताबें होंगी।
बाद में पता चला कि इन 6 किताबों के बग़ैर आज हमारा दीन समझना मुश्किल था।_
1. सिहाह सित्ता क्या है?
सिहाह सित्ता 6 किताबों का मजमुआ
है:
1. *सहीह बुखारी* - इमाम मुहम्मद बिन इस्माइल बुखारी
2. *सहीह मुस्लिम* - इमाम मुस्लिम बिन हज्जाज निशापुरी
3. *सुनन अबू दाऊद* - इमाम अबू दाऊद सिजिस्तानी
4. *सुनन तिर्मिज़ी* - इमाम अबू ईसा मुहम्मद तिर्मिज़ी
5. *सुनन नसाई* - इमाम अहमद बिन शुऐब नसाई
6. *सुनन इब्ने माजह* - इमाम मुहम्मद बिन यज़ीद इब्ने माजह
इन
6 को सिहाह सित्ता इसलिए कहते हैं क्योंकि इनमें ज़्यादातर अहादीस सही या हसन दर्जे
की हैं। खुसूसन बुखारी और मुस्लिम को "सहीहैन" कहते हैं, यानी इनकी हर हदीस
पर उम्मत का इज्मा है कि ये बिल्कुल सही हैं।
_यहां
एक बात नोट करने वाली है। लोग अक्सर समझते हैं कि "सिहाह" का मतलब है इनमें
एक भी ज़ईफ हदीस नहीं। ऐसा नहीं है। बुखारी मुस्लिम के अलावा बाकी 4 में ज़ईफ भी हैं,
लेकिन मुहद्दिसीन ने साफ साफ बता दिया है कि कौन सी ज़ईफ है। यही अमानतदारी इनकी सबसे
बड़ी पहचान है।_
1. इमाम बुखारी R.A. - 194H से 256H
पूरा
नाम: अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन इस्माइल बिन इब्राहीम बिन मुगीरह अल बुखारी
पैदाइश: 13 शव्वाल 194 हिजरी, बुखारा, उज़्बेकिस्तान
वफ़ात: 1 शव्वाल 256 हिजरी, खरतंक, समरकंद
इमाम
बुखारी को "अमीरुल मोमिनीन फिल हदीस" कहा जाता है। 10 साल की उम्र में हदीस
हिफ्ज़ करना शुरू किया। 16 साल की उम्र में अपनी वालिदा और भाई के साथ हज पर गए और
मक्का में ही रुक कर इल्म हासिल किया।
_सोचता
हूं, 16 साल की उम्र में हम लोग क्या कर रहे होते हैं? और इमाम बुखारी उस उम्र में
घर छोड़ कर मक्का में इल्म के लिए रुक गए। ये जुनून आज कहां मिलता है?_
सहीह बुखारी की खुसूसियत:
इमाम
बुखारी ने 6 लाख अहादीस में से सिर्फ 7275 अहादीस मुन्तखब की। बिना रिपीट के 2602 अहादीस
हैं। हर हदीस लिखने से पहले गुस्ल करते, 2 रकात नफिल पढ़ते और इस्तिखारा करते। 16 साल
में ये किताब मुकम्मल हुई। इसका पूरा नाम है "अल जामे अल मुसनद अस सहीह अल मुख्तसर
मिन उमूरी रसूलिल्लाह ﷺ व सुननिही व अय्यामिही"।
अहम वाक़िया: जब इमाम बुखारी निशापुर गए तो 70,000 लोग उनके दर्स में शामिल
हुए। इमाम मुस्लिम खुद उनके शागिर्द थे। _एक रिवायत में आता है कि दर्स इतना बड़ा था
कि आवाज़ पहुंचाने के लिए 7 आदमी खड़े होते थे जो एक दूसरे तक इमाम की बात पहुंचाते
थे। अंदाज़ा लगाओ क्या मक़ाम होगा।_
_एक
और बात इमाम बुखारी के बारे में। कहते हैं उनको बचपन में आंखों की बीमारी हो गई थी।
वालिदा ने रात भर रो रो कर दुआ की। ख्वाब में हज़रत इब्राहीम A.S. ने आके कहा
"तेरे आंसुओं की वजह से अल्लाह ने तेरे बेटे की आंखें वापस कर दी।" सुबह
उठते ही आंखें ठीक थीं। इसी लिए कहते हैं जिसकी मां की दुआ लग जाए वो इमाम बुखारी बन
जाता है। आज हम मां बाप को वक़्त नहीं देते। इन बुजुर्गों की कामयाबी के पीछे मां बाप
की दुआ थी।_
2. इमाम मुस्लिम R.A. - 204H से 261
पूरा नाम: अबुल हुसैन मुस्लिम बिन अल हज्जाज अल क़ुशैरी अन निशापुरी
पैदाइश: 204 हिजरी, निशापुर, ईरान
वफ़ात: 25 रजब 261 हिजरी
इमाम
मुस्लिम, इमाम बुखारी के खास शागिर्द थे। 15 साल की उम्र में हदीस सुनना शुरू किया।
इराक़, हिजाज़, शाम, मिस्र का सफर किया।
_इमाम
बुखारी और इमाम मुस्लिम का रिश्ता उस्ताद शागिर्द का था, लेकिन दोनों में कितना अदब
था। कहते हैं इमाम मुस्लिम ने एक बार इमाम बुखारी के माथे पर बोसा दिया और कहा:
"ऐ उस्ताद, मुझे इजाज़त दीजिए कि आप के क़दम चूमूं।"_
सहीह मुस्लिम की खुसूसियत:
इसमें
12,000 अहादीस हैं, बिना रिपीट के 4000। इमाम मुस्लिम ने किताब को अबवाब में तक़सीम
किया और एक ही हदीस की मुख्तलिफ सनदें एक जगह जमा कर दी। इसलिए फुक़हा के लिए सहीह
मुस्लिम ज़्यादा आसान है। इमाम मुस्लिम ने खुद कहा: "मैंने अपनी किताब में सिर्फ
उन्हीं अहादीस को जमा किया है जिन की सेहत पर मुहद्दिसीन का इज्मा है।"
_मैं
अक्सर सोचता हूं कि अगर इमाम मुस्लिम न होते तो शायद एक ही हदीस की 10 सनदें अलग अलग
जगह मिलती। उन्होंने हमारा कितना वक़्त बचा दिया।_
_इमाम
मुस्लिम का एक वाक़िया और दिल छू लेता है। एक बार दर्स के दौरान खजूर की गुठली मुंह
में थी। किसी ने मसला पूछा। जवाब देने के चक्कर में गुठली हलक़ में फंस गई। लेकिन हदीस
का अदब देखो, गुठली नहीं थूकी। जब तक मजलिस खत्म न हुई, तकलीफ सहते रहे। बाद में इंतिक़ाल
की वजह भी वही गुठली बनी। सुब्हानअल्लाह, ये था हदीस से इश्क़। आज हम लेक्चर में फोन
चलाते हैं।_
3. इमाम अबू दाऊद R.A. - 202H से 275H
पूरा नाम: अबू दाऊद सुलेमान बिन अल अशअस अस सिजिस्तानी
पैदाइश: 202 हिजरी, सिजिस्तान, ईरान
वफ़ात: 275 हिजरी, बसरा
इमाम
अबू दाऊद ने 5 लाख अहादीस में से 4800 अहादीस मुन्तखब करके "सुनन अबू दाऊद"
मुरत्तब की। ये किताब "सुनन" है, यानी इसमें अहकाम वाली अहादीस ज़्यादा हैं।
*सुनन
अबू दाऊद की खुसूसियत:*
इमाम
अबू दाऊद ने कहा: "मैंने इस किताब में सिर्फ अहकाम की अहादीस लिखी हैं। 4800 अहादीस
एक आम मुसलमान के दीन के लिए काफी हैं।" _ये जुमला पढ़ कर मैं हैरान रह गया।
4800 हदीस! और हम समझते हैं कि दीन बहुत मुश्किल है। इमाम साहब ने तो नुस्खा ही बता
दिया।_ इसमें ज़ईफ अहादीस भी हैं लेकिन इमाम साहब ने उनकी निशानदेही कर दी है। इमाम
ग़ज़ाली ने कहा कि फिक़्ह के लिए क़ुरआन के बाद सहीह बुखारी और सुनन अबू दाऊद काफी
है।
4. इमाम तिर्मिज़ी R.A. - 209H से 279H
पूरा नाम: अबू ईसा मुहम्मद बिन ईसा अत तिर्मिज़ी
पैदाइश: 209 हिजरी, तिर्मिज़, उज़्बेकिस्तान
वफ़ात: 279 हिजरी, तिर्मिज़
इमाम
तिर्मिज़ी, इमाम बुखारी के खास शागिर्द थे। आखिरी उम्र में नाबीना हो गए थे लेकिन हिफ्ज़
इतना मज़बूत था कि 1 लाख अहादीस ज़ुबानी याद थी।
_कभी
कभी सोचता हूं, आज हम मोबाइल में लिख कर भी भूल जाते हैं। और इमाम तिर्मिज़ी अंधे होने
के बाद भी 1 लाख हदीस सीना में लिए फिरते थे। अल्लाह ने क्या ज़ेहन दिया था।_
*सुनन
तिर्मिज़ी / जामे तिर्मिज़ी की खुसूसियत:*
इस
किताब में 3956 अहादीस हैं। इमाम तिर्मिज़ी की सबसे बड़ी खिदमत ये है कि उन्होंने हर
हदीस के बाद उसका दर्जा बताया: सहीह, हसन, ज़ईफ, ग़रीब। "हसन" की इस्तिलाह
सबसे पहले इमाम तिर्मिज़ी ने दी। _यही वजह है कि जब कोई कहता है "हदीस हसन है"
तो समझ जाओ तिर्मिज़ी का कमाल है।_ इसके अलावा ये भी बताते हैं कि किस इमाम का उस हदीस
पर क्या अमल है। इसलिए ये किताब एक "मुजतहिद" की तरह है।
5. इमाम नसाई R.A. - 215H से 303H
परा नाम: अबू अब्दुर रहमान अहमद बिन शुऐब अन नसाई
पैदाइश: 215 हिजरी, नसा, तुर्कमेनिस्तान
वफ़ात: 303 हिजरी, फिलिस्तीन
इमाम
नसाई को "शैखुल इस्लाम" कहा जाता है। आप बहुत एहतियात से हदीस लेते थे। अगर
किसी रावी में ज़रा भी शक होता तो उसकी हदीस न लेते।
_इनकी
एहतियात का ये आलम था कि कहते हैं एक बार सफर में थे। किसी शख्स से हदीस लेनी थी। देखा
वो शख्स अपने जानवर को बुलाने के लिए खाली झोली हिला रहा था जैसे उसमें दाना हो। इमाम
नसाई वापस आ गए। बोले "जो जानवर से झूठ बोल सकता है, वो हदीस में भी कर सकता है।"
ये था मयार।_
सुनन नसाई की खुसूसियत:
पहले आपने "अस सुनन अल कुबरा" लिखी जिसमें
12,000 अहादीस थीं। फिर उसको मुख्तसर करके "अस सुनन अस सुग़रा" बनाई जिसे
"मुजतबा" भी कहते हैं। इसमें 5761 अहादीस हैं। मुहद्दिसीन कहते हैं कि सहीहैन
के बाद सबसे ज़्यादा सहीह किताब सुनन नसाई है। इसमें फिक़्ही अबवाब की तरतीब बहुत उम्दा
है।
6. इमाम इब्ने माजह R.A. - 209H से 273H
पूरा नाम: अबू अब्दुल्लाह मुहम्मद बिन यज़ीद इब्ने माजह अल क़ज़वीनी
पैदाइश: 209 हिजरी, क़ज़वीन, ईरान
वफ़ात: 273 हिजरी, क़ज़वीन
इमाम
इब्ने माजह ने इराक़, हिजाज़, शाम, मिस्र का सफर किया। 30 साल से ज़्यादा इल्म हासिल
करने में लगाए।
30
साल! आज हम 3 महीने में कोर्स करके सर्टिफिकेट मांगते हैं। इन बुजुर्गों ने उम्र लगा
दी और फिर भी कहते थे "इल्म समुंदर है"।_
सुनन इब्ने माजह की खुसूसियत:
इसमें
4341 अहादीस हैं जिनमें 3002 अहादीस ऐसी हैं जो बाकी 5 किताबों में नहीं।
इसलिए इसकी अहमियत है। लेकिन इसमें ज़ईफ अहादीस की तादाद बाकी 5 किताबों से ज़्यादा
है, तक़रीबन 30 प्रतिशत। इसी वजह से कुछ उलमा इसको सिहाह सित्ता में शामिल नहीं करते
और उसकी जगह "मुवत्ता इमाम मालिक" को रखते हैं। लेकिन जुम्हूर के नज़दीक
सिहाह सित्ता की छठी किताब सुनन इब्ने माजह ही है।
_मैं
इस इख्तिलाफ को पर्सनली इस तरह देखता हूं: जैसे 6 भाई हों, 5 ताक़तवर हों, 1 थोड़ा
कमज़ोर। लेकिन है तो भाई ही न। उसको निकाल नहीं सकते। इब्ने माजह की 3002 यूनिक अहादीस
की वजह से ये सिहाह सित्ता का हिस्सा है।_
8. सिहाह सित्ता क्यों कहते हैं? 4 वजहात
वजह 1: सेहत का आला मयार
बुखारी
और मुस्लिम की 100 प्रतिशत अहादीस सही हैं। बाकी 4 किताबों में भी अक्सर अहादीस सहीह
या हसन हैं। ज़ईफ अहादीस बहुत कम हैं और उनकी निशानदेही कर दी गई है।
वजह 2: उम्मत का इज्मा और क़ुबूलियत
12
सदियों से पूरी उम्मत ने इन 6 किताबों को क़ुबूल किया है। मदारिस में दौरा ए हदीस इन्हीं
6 किताबों का होता है। जो शख्स इन 6 किताबों को पढ़ ले उसे "आलिम" तस्लीम
किया जाता है। _मेरे उस्ताद कहते थे: "बेटा, सिहाह सित्ता पढ़ ली तो समझो समुंदर
का पानी चख लिया। अब पूरा समुंदर न भी पियो, ज़ायक़ा मालूम हो गया।"_
वजह 3: जामईयत
इन
6 किताबों में दीन के तमाम शोबों का अहाता हो जाता है: अक़ाइद, इबादत, मुआमलात, अख़लाक़,
तफसीर, तारीख, फ़ज़ाइल, फितन। इसलिए इनको "सिहाह" यानी सेहत वाली और
"सिट्टा" यानी 6 कहा गया।
वजह 4: रिवायात की छान बीन
_ये
इमामों का सबसे बड़ा कमाल है। आज के दौर में हम व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर यक़ीन कर लेते
हैं। लेकिन इन्होंने हर रावी की ज़िंदगी चेक की। वो सच्चा है या झूठा, उसकी याददाश्त
कैसी है, वो अपने उस्ताद से मिला भी था या नहीं। एक एक हदीस के लिए कई महीने सफर किया।
इमाम बुखारी ने एक हदीस के लिए मिस्र से बग़दाद का सफर किया। वहां पहुंच कर देखा वो
शख्स झूठ बोल कर जानवर को बुला रहा था। वापस आ गए, हदीस नहीं ली। ये मयार था इनका।
इसलिए इन 6 किताबों पर उम्मत का भरोसा है।_
_आज
के दौर में जब हर चीज़ गूगल पर है, लोग कहते हैं किताबों की क्या ज़रूरत। लेकिन ये
6 किताबें गूगल नहीं हैं। ये मेहनत हैं, कुर्बानी हैं, रातों की नींद और दिन का चैन
हैं। 16-16 साल एक किताब पर लगाना आसान नहीं।_
आज के लिए सबक़
_मैं
अक्सर सोचता हूं इन 6 किताबों से हम क्या सीख सकते हैं? 3 चीज़ें: 1. मेहनत - बिना
मेहनत कुछ नहीं मिलता। 16 साल, 30 साल लगाए इन्होंने। 2. अमानत - ज़ईफ हदीस भी लिखी
लेकिन साफ बता दिया। 3. इखलास - नाम के लिए नहीं, अल्लाह के लिए काम किया। आज हमारे
पास फोन में PDF है, लेकिन पढ़ने का वक़्त नहीं। ये इमामों ने हाथों से लिखा था, चिराग़
की रोशनी में। क़दर करनी चाहिए।_
खात्मा
ये
6 इमाम अल्लाह की अज़ीम नेमत थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का एक एक लम्हा हदीस को महफूज़
करने में लगा दिया। आज अगर हमारे पास नबी ﷺ का फरमान महफूज़ है तो इन्हीं इमामों की मेहनत का नतीजा है।
_कभी तन्हा बैठ कर सोचता हूं कि अगर ये लोग न होते तो? न बुखारी होती, न मुस्लिम। हम
तक दीन कैसे पहुंचता? रूह कांप जाती है।_ अल्लाह तआला इन सब को जन्नतुल फिरदौस में
आला मक़ाम अता फरमाए। आमीन।
_आखिर
में बस इतना कहूंगा कि इन किताबों को पढ़ना सिर्फ आलिम का काम नहीं। हम जैसे आम लोग
भी तर्जुमा पढ़ सकते हैं। कम से कम रियाज़ उस सालिहीन या मिश्कात से शुरुआत करें जो
इन्हीं 6 किताबों का निचोड़ है।_
_आखिर
में एक गुज़ारिश। अगर ये आर्टिकल पसंद आए तो मेरे लिए भी दुआ कर देना कि अल्लाह मुझे
भी दीन की खिदमत की तौफीक़ दे। और इन इमामों के सदक़े हम सब की मग़फिरत फरमाए। आमीन।
Writer:
Hafiz Nawazish

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